ऐसे मनाया जाता था ” सुशील भैया ” का जन्मदिन…..चार सितंबर को उनके जन्मदिन के अवसर पर विशेष लेख…..
बस्तर बन्धु के संस्थापक सुशील शर्मा जी के जन्मदिवस की 62वीं वर्षगांठ के अवसर पर विशेष

ऐसे मनाया जाता था सुशील भैया’ का जन्मदिन,,,,,
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▪️अनूप शर्मा▪️


▪️बस्तर बन्धु▪️
कांकेर – आज 4 सितंबर को एक बार फिर हम सब ‘भैया ‘ को याद कर रहे हैं जबकि उनका जन्मदिन तो आया है ,मगर उनके बिना,,,, जन्मदिन प्रत्येक वर्ष आएगा, किंतु हम लोग उन्हें स्मृति दिवस के रूप में अवश्य मनाएंगे ,मनाते रहेंगे।
हमारे देश में अधिकतर पत्रकारों का जन्म दिवस किसी बड़े होटल अथवा ढाबे में सामिष भोजन तथा कलियुगी सोमरस के साथ
मनाया जाता है लेकिन भैया के साथ यह बात नहीं थी । प्रत्येक जन्मदिवस पर उन्हें ब्राह्म मुहूर्त में उठकर तैयार होते देखा गया है। उनका जन्मदिन माता-पिता के चरण स्पर्श से प्रारंभ होता था। तत्पश्चात छत्तीसगढ़ी में जिसे “बड़े फजर ” कहा जाता है, सारे शहर का भ्रमण अकेले करते हुए समस्त संबंधी / परिचित बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर प्रातः काल की बेला में ही उनका शुभ आशीर्वाद प्राप्त किया करते थे। मित्रों के यहां पहुंचकर उनके नाश्ते के समय से पहले ही मिठाई का डब्बा भेंट कर गले मिलकर जाते थे । बच्चों के लिए उनके प्रिय केक आदि खाद्य पदार्थों की पर्याप्त व्यवस्था रहती थी। विशिष्ट मित्रों के लिए घर में बनी हुई मिठाई पहुंचाई जाती थी। राजापारा के मंदिर समूह में देवी देवताओं के दर्शन हेतु जाने के पश्चात गरीबों को गुप्तदान अवश्य करते थे । गुप्त दान इतने गुप्त रूप से दिया जाता था कि इस सीक्रेट को उनका सेक्रेटरी भी (यदि कोई साथ होता भी तो ) नहीं जान पाता था। इसके पश्चात मोबाइल/ फोन पर आई हुई बधाइयां एवं शुभकामनाओं के प्रत्युत्तर स्वयं दिया करते थे। उन्हें इतने सारे फोन नंबर ज़बानी याद थे कि सुनने वाले को आश्चर्य होता था। धन्यवाद तथा आभार प्रदर्शन में कभी किसी का नाम नहीं भूलते थे ,चाहे वह उनका कोई हाॅकर ही क्यों ना हो? स्वयं के अखबार में अपने जन्म दिवस पर विशेषांक प्रकाशित करने का सुझाव वह हमेशा विनम्रता पूर्वक अस्वीकार कर देते थे, चाहे उन्हें विज्ञापनों का कितना ही बड़ा प्रलोभन क्यों न दिया गया हो? उन्होंने जब भी इस प्रकार के विशेष अंक प्रकाशित किये, वे मात्र दिवंगत लोगों की याद में ही प्रकाशित किये। यही कारण है कि स्वर्गवासी पूर्वजों तथा अन्य दिवंगत बुजुर्गों की दुआएं एवं आशीर्वाद उनके साथ रहे और हमेशा उनका मनोबल बढ़ाते रहे। डरना तो कभी जानते ही नहीं थे। जितनी निर्भयता के साथ वे अपराधी तत्वों के खिलाफ लिखते थे, उतनी ही निडरता से
देश के बड़े से बड़े नेताओं और तोपों के खिलाफ भी लिखा करते थे। अक्सर कहा करते थे कि “डरते नहीं किसी से, चाहे किसी का बाप हो, रास्ता वही चलेंगे जो सीधा और साफ हो ” उन्हें गांधी जी द्वारा अंग्रेजों के प्रति कहा गया यह वाक्य भी बहुत पसंद था, “ज़ालिम तेरी जेल कचहरी देखी है और देखेंगे।” इस वाक्य में कभी-कभी वे जालिम की जगह शासन शब्द का प्रयोग कर लिया करते थे। उनकी पत्रकारिता के 44 वर्षों में अनेक सरकारी बदलीं लेकिन किसी भी सरकार की जेल कचहरी उन्हें भयभीत नहीं कर सकी। जमानत पर बाहर आते ही वे फिर वही कार्य पूरी निडरता से करने लगते थे, जिसके लिए उन्हें अंदर जाना पड़ा था। कई बार तो वे जानबूझकर उस विशेष लेख को दोबारा इस टिप्पणी के साथ प्रकाशित कर देते थे कि देखिए इसी लेख के कारण हमें जेल कचहरी देखनी पड़ी थी। यही कारण था कि कोई उन्हें दुस्सा हसी पत्रकार कहता था, तो कोई उन्हें खतरनाक पत्रकार भी कह देता था। लोगों को आश्चर्य भी होता था जब अपने साहसिक (अथवा दुस्साहसिक ) लेखन के कारण उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल जाया करते थे । जिनका विस्तृत वर्णन हमने अपने पिछ्ले अंकों में किया था। आशा है, पाठकों को याद होगा। हार्दिक श्रद्धा सुमन,,,,,,
