दुर्ग जिले का मालिक मकबूजा कांड….बस्तर बन्धु की खबर का असर राज्य सरकार करेगी कार्यवाही…..अन्य अखबार भी बस्तर बन्धु से प्रेरित होकर उठा रहें हैं बस्तर बन्धु की खबर…..
जिनके कार्यकाल में मालिक मकबूजा कांड हुआ उन्हें ही सीसीएफ का प्रभार देकर दो दो सर्कल की जिम्मेदारी दे दी गई....जांच कमेटी द्वारा दो दो बार जांच रिपोर्ट सौंपने के बाद भी जांच रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई.....वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा लिपा पोती की जा रही हैं....

बस्तर बंधु की ख़बर का असर,,,, राज्य सरकार करेगी कार्यवाही,,,,अन्य अख़बार भी बस्तर बंधु से प्रेरित,,,,,
▪️अनूप शर्मा▪️
(बस्तर बन्धु)
रायपुर/कांकेर – बस्तर बंधु के विगत अंक में प्रकाशित दुर्ग जिले के मालिक मकबूजा कांड संबंधी बैनर न्यूज़ आर्टिकल का व्यापक प्रभाव देखने में आ रहा है। उक्त विस्तृत रिपोर्ट 2 वर्ष पूर्व हमारे संस्थापक संपादक रहें स्व.सुशील शर्मा जी द्वारा एक खोजी पत्रकार की हैसियत से तैयार की गई थी। इस रिपोर्ट को हमने 2 वर्ष बाद पुनः प्रकाशित इसलिए किया क्योंकि सरकार की ओर से कोई कार्यवाही होती दिखाई नहीं दे रही थी। इस बार बस्तर बन्धु के प्रकाशन के पश्चात विभाग की नींद खुली दिखाई दे रही हैं….अब जाकर मालूम हो रहा है कि राज्य सरकार शीघ्र ही कुछ बड़े अधिकारियों तथा व्यापारियों पर मालिक मकबूजा कांड में लिप्त होने के कारण कार्यवाही करने जा रही है। यह अब थोड़े समय की ही बात रह गई है। क्योंकि विधानसभा के चुनाव सामने हैं और सरकार को अपना भ्रष्टाचार विरोधी चेहरा दिखाना है, तो हँसकर या रोधो कर ,कैसे भी कुछ ना कुछ तगड़ी कार्यवाही दिखानी ही पड़ेगी, अन्यथा मालिक मकबूजा कांड में बदनामी का कलंक झेलते हुए विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ सकता है।
बताया जाता है कि मालिक मकबूजा कांड के सबसे बड़े खलनायक दिलराज प्रभाकर नाम के अफसर हैं, जो तत्कालीन दुर्ग डीएफओ थे। इन्होंने महाराष्ट्र के लकड़ी तस्करों को अनुचित तथा अवैध तरीके से ट्रांजिट पास दिलवाए थे। 1-1 ट्रांजिट पास से एक-एक ट्रक सागौन की बहुमूल्य लकड़ी पार की जा सकती थी। सोचिए, कितने करोड़ का चूना लगा होगा शासन को?,,,
दिलराज प्रभाकर वही अफसर हैं जो भाजपा शासन के समय खैरागढ़ के वन मंडलाधिकारी थे। उन पर विभिन्न 45 प्रकरण बनाए गए थे लेकिन उस समय वह अपने विभिन्न चालबाजी के कारनामों से किसी में भी दंडित होने से बच गए थे। अब कांग्रेस के शासन में भी साढ़े 4 साल तक तो उन्होंने मजे किए हैं, आगे देखिए क्या होता है?
मालिक मकबूजा कानून कहता है कि निजी भूमि पर भी यदि सागौन या सागौन जैसे प्रतिबंधित वृक्ष हों तो निजी भूमि का मालिक उसे काटने के लिए वन विभाग से स्वीकृति लेने को बाध्य है और नहीं लेता तो दंडित किया जा सकता है । उपरोक्त कुख्यात मालिक मकबूजा कांड में ऐसे कई निजी भूमि मालिक तर गए। महाराष्ट्र के तस्कर व्यापारियों को लाभ पहुंचाने के लिए दिलराज प्रभाकर और उनके संगी साथियों ने उन्हें यहां तक छूट दे दी कि वे वृक्ष कटाई के बाद बिना उसे डिपो तक पहुंचाए सीधे जंगल से ही महाराष्ट्र ले जा सकते हैं। वह भी ट्रांजिट पास के साथ । नियम कहता है कि पहले लकड़ी डिपो में लाई जाती है, वहां की औपचारिकताओं के पश्चात ही व्यापारी ट्रांजिट पास मांग सकता है और माल अपने स्थान पर ले जा सकता है। यहां दूसरे राज्य का मामला था, फिर भी वन विभाग के अफसरों ने पैम्फलेट की तरह ट्रांजिट पास वितरण किए । स्पष्ट है कि रिश्वत की लंबी रकम खाए बगैर तो उन्होंने ऐसा नहीं किया होगा। आश्चर्य की बात यह भी है कि मालिक मकबूजा के वृक्षों की कटाई के लिए नायब तहसीलदार स्तर के अधिकारी ने परमिशन दी जबकि कलेक्टर की जानकारी के बिना और कलेक्टर द्वारा अधिकृत अधिकारी के हस्ताक्षर के बिना मालिक मकबूजा कार्यवाही में कुछ नहीं हो सकता, परमिशन तो बहुत दूर की बात है। दुर्ग जिले के 21 वीं सदी के इस मालिक मकबूजा कांड में उपरोक्त लिखी गई बातों में से हर एक का उल्लंघन हुआ है और अफसरों ने मनमानी करते हुए लकड़ी तस्करों को लाखों-करोड़ों का नाजायज लाभ पहुंचाया है। धांधली यहां तक हुई है कि ध्रुव कश्यप नाम के व्यक्ति को ट्रांजिट पास दे दिया गया जोकि काटे गए सागौन वृक्ष की भूमि का स्वामी ही नहीं था । किसी की भी भूमि से पेड़ काटकर बिना अपनी मिल्कियत का सबूत दिए ट्रांजिट पास हथिया लेने का यह विचित्र उदाहरण है। ऐसे और भी उदाहरण हो सकते हैं जो अब तक प्रकाश में नहीं आए। क्या लकड़ा तस्कर पकड़े जाएंगे और क्या दिलराज प्रभाकर से 19 लाख से अधिक की रकम की वसूली की जा सकेगी? शासकीय सूत्रों की मानें तो ऐसा होने जा रहा है।
▪️दिलचस्प तथ्य▪️
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हमारे पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि मालिक मकबूजा कांड के खलनायक तत्कालीन डीएफओ दिलराज प्रभाकर को सजा देने की बजाय सरकार ने उनका प्रमोशन कर दिया है।
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वर्तमान में यह महोदय सीसीएफ बने हुए हैं और रायपुर तथा दुर्ग दोनों ही सर्किल उनके चार्ज में आते हैं।
आपको याद होगा कि भाजपा के 15 वर्ष के शासन में ऐसे कई भ्रष्ट अफसरों को दंड के बदले पुरस्कार दिया गया है लेकिन कांग्रेस शासन में भी वहीं प्रथा चालू रहेगी, यह किसने सोचा था। कहीं ऐसा ना हो कि उनके पुराने कारनामों की जांच का जिम्मा भी उन्हीं को दे दिया जाए। छत्तीसगढ़ के वन विभाग में आप जानते होंगे कि सन् 2000 से अब तक कुछ भी होता चला आ रहा है। भूपेश दाऊ को सोचना चाहिए कि भ्रष्टों को प्रमोशन देने की यही पालिसी उनके द्वारा जारी रहेगी, तो चुनाव में तो असर पड़ेगा ही, क्योंकि विपक्ष को बैठे-बिठाए ,बिना प्रयत्न किए, एक तगड़ा मुद्दा सरकार ने स्वयं दे दिया है।
