बस्तर बन्धु के संस्थापक स्वर्गीय सुशील शर्मा जी की पुण्यतिथि पर विशेष लेख…..कुछ अनजानी बातें,,,,,,,
पत्रकारिता के क्षेत्र में अनेक राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय पुरस्कार से पुरुस्कृत स्व.सुशील शर्मा जी की दमदार लेखनी जिसे आज भी लोग याद करतें हैं....

स्वर्गीय सुशील शर्मा ,
कुछ अनजानी बातें,,,,,,,
6 अगस्त बस्तर बन्धु के संस्थापक संपादक स्व.सुशील शर्मा जी के प्रथम पुण्यतिथि पर विशेष लेख…..
सत्य की राह के राही कभी रुकते नहीं थे,
किसी अन्याय के आगे कभी झुकते नहीं थे
कचहरी जेल भी स्वीकार थी सच्चाई की खातिर
किसी बेईमान के नोटों पे वो बिकते नहीं थे,,,,,,,।

▪️अनूप शर्मा ▪️
(बस्तर बन्धु)
कांकेर – 6 अगस्त को 1 वर्ष पूर्ण हुआ , जब उन्होंने अल्पकालीन व्याधि के पश्चात अंतिम सांस ली थी। विगत 31 जुलाई को पूज्य पिताजी पवन कुमार शर्मा जी भी स्वर्गवासी हो गए । धार्मिक रीति रिवाज के अनुसार अब अगले वर्ष सुशील जी की बरसी अपने पिताजी की बरसी के साथ ही धार्मिक रीति रिवाज़ों के अनुसार संपन्न होगी।
इस एक वर्ष की अवधि में सुशील जी बहुत याद किए गए। बस्तर बंधु जैसा धमाकेदार, बस्तर का ब्लिट्ज़ कहे जाने वाला अख़बार भी बहुत याद किया गया। वे तो अब नहीं आ सकते, किंतु संतोष की बात यह है कि उनका बस्तर बंधु अब उन्हीं तेज़तर्रार तेवरों के साथ पुनर्जीवित हो चुका है। उन्होंने लगभग 27 वर्ष तक बस्तर बंधु का संपादन किया और बड़ी निडरता और दिलेरी के साथ बड़े-बड़े भ्रष्ट तोपों की पोल खोलते रहे। कांकेर ही नहीं रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग ,भिलाई, अंबिकापुर, बैकुंठपुर तक के भ्रष्टों के हाथ पांव कांपने लगते थे, जब उन्हें कोई बताता था कि बस्तर बंधु का बंडल आ गया है। एक खोजी पत्रकार के रूप में उनकी प्रसिद्धि इतनी अधिक थी कि जिस शहर में वह देखे जाते थे वहां घबराए हुए भ्रष्ट लोग अटकलें लगाने लगते थे कि पता नहीं बस्तर बंधु का अगला अंक कौन सा धमाका करने वाला है और हमारे शहर या राजधानी के किस भ्रष्ट अफसर या पूंजीपति के सर पर हथौड़ा गिरने वाला है?
बहुत से लोगों को यह नहीं मालूम होगा कि सुशील शर्मा के चुने हुए लेख मात्र हिंदी में ही नहीं बल्कि अंग्रेजी के अख़बार संडे वीकली, स्टेट्समैन तथा बंगाली के अख़बार आनंद बाज़ार पत्रिका में भी प्रकाशित होते थे। वे स्वयं बांग्ला भाषा के अच्छे जानकार थे और अंग्रेजी में उनके खास खास लेखों के अनुवाद परितोष दादा (लोकायत पत्रिका वाले) किया करते थे। यही नहीं असमी भाषा में उनके लेखों के अनुवाद रत्नेश्वर नाथ किया करते थे और उड़िया भाषा में जनार्दन मंगराज (परिवर्तन संस्था वाले) करते थे, जो संवाद, हिम्मत ,धरित्री,आदि लोकप्रिय उड़िया समाचार पत्रों में प्रकाशित होते थे। इन अनुवादों के संबंध में उनके अंतरंग मित्र भी नहीं जानते थे। इसी तरह जब एक बार पत्रकारिता संबंधी एक बड़े प्रतिष्ठान के द्वारा उस वर्ष के श्रेष्ठ पत्रकार सम्मानित किए गए तो पहला पुरस्कार सम्मान अंग्रेजी के जाने-माने पत्रकार पी साईनाथ को प्रदान किया गया जोकि स्वर्गीय राष्ट्रपति वीवी गिरी के सुपुत्र थे लेकिन द्वितीय स्थान पर किस पत्रकार को रखा गया, यह जानकर छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश के तो सारे ही पत्रकार चौंक गए क्योंकि वह नाम था बस्तर बंधु के संपादक सुशील शर्मा का,,,। आत्म प्रचार से दूर रहने वाले सुशील जी ने अपने सम्मान का कहीं कोई ढिंढोरा नहीं पीटा और चुपचाप दिल्ली जाकर पुरस्कार ले आए। इसी तरह कई राष्ट्रीय, प्रादेशिक और जिला स्तर के पुरस्कार सम्मान उन्हें मिलते रहे किंतु उन्हें इसका प्रचार करने की कभी फुर्सत ही नहीं मिली।
इसी तरह जब उनकी पुस्तक “बस्तर का मालिक मकबूज़ा कांड” प्रकाशित होकर पुरस्कृत हुई और कुछ ही समय में उसकी एक-एक प्रति भी बिक गई अथवा समाप्त हो गई , फिर भी उन्होंने इतने बड़े समाचार का भी प्रचार नहीं किया। एक और अनजाना तथ्य उनके बारे में यह है कि उनके पोल खोलू समाचारों से बिलबिलाते हुए अनेक भ्रष्टों ने उनके खिलाफ़ मानहानि के दावे दायर किए । ऐसे मामले 50 से भी अधिक रहे होंगे, जो किसी भी पत्रकार के लिए एक रिकॉर्ड संख्या है किंतु दावा दायर करने वालों को भारी निराशा हुई होगी, जब हर मामले में भ्रष्टों को अदालत में मुंह की खानी पड़ी थी और सच-सच लिखने वाले सुशील शर्मा की विजय हुई थी। भ्रष्ट लोग केस लड़ते रहे, अपील पर अपील करते रहे लेकिन एक भी मामले में सुशील शर्मा जी को सज़ा दिलवाने के उनके अरमान पूरे नहीं हुए। वे सब खिसियानी बिल्ली की तरह खंभा नोचते रह गए । अपने अख़बार में उन्होंने किसी भ्रष्ट को नहीं बख्शा ,चाहे वह कोई छोटा कर्मचारी हो, कलेक्टर हो , मुख्यमंत्री हो या प्रधानमंत्री हो। ईमानदारों का साथ दिया और धूर्तों को ,ठगों को 420 और मक्कार तक लिखने में कोई हिचक अनुभव नहीं की। कोई धमकी भरा फोन आता था, तो वे स्पष्ट जवाब देते थे कि जो करना है कर लो,अदालत कचहरी सब खुली हैं। मेरे पास सबूत है और वह मैं तुमको नहीं बताऊंगा सीधे अदालत में पेश करूंगा। यह खरी खरी सुनकर धमकाने वाले के पास फोन रखने के अलावा कोई चारा नहीं रहता था। वह खानदानी कांग्रेसी थे लेकिन पंजा छाप भाजपाइयों को और फूलछाप कांग्रेसियों को अच्छी तरह पहचानते थे और मौके से उनका नाम भी उजागर कर देते थे। ऐसे लोगों ने बस्तर बंधु के आगे बहुत कांटे बिछाए । बहुत षड्यंत्र किए लेकिन सारी बाधाओं को पार कर सुशील शर्मा अपना पेपर निकालते ही रहे। जेल और कचहरी उन्होंने अपनी पत्रकारिता में बहुत देखी थी और इसके नाम से उन्हें कोई डरा नहीं सकता था। अपने अंतिम वर्ष में उन्होंने सेहत के प्रति लापरवाही दिखाई थी, जो घातक सिद्ध हुई । उनके मस्तिष्क में तब भी कुछ बड़ी योजनाएं थीं, जैसे कि वे बस्तर बंधु को दैनिक अख़बार के रूप में निकालना चाहते थे और बस्तर का मालिक मकबूज़ा कांड जैसी दो तीन पुस्तकें और लिखना चाहते थे। अपने जैसे कुछ और जुझारू पत्रकार तैयार करना चाहते थे किंतु अचानक स्वास्थ्य बिगड़ने से उनके मन की मन में ही रह गई और उन्हें असमय स्वर्ग गमन करना पड़ गया। बस्तर बंधु परिवार एवं मित्र मण्डली की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि,,,, पुष्पांजलि,,,आदरांजलि,,,, वे नहीं हैं तो क्या, उनकी यादें अमर हैं, उनका मानस पुत्र बस्तर बंधु जिंदा है और प्रदेश की आम जनता का साथ हर क़दम पर देता रहेगा।
