_कहाँ वह खो गया काँकेर ?_ जहाँ ऐसी भी होली थी !


_कहाँ वह खो गया काँकेर ?_
*जहाँ ऐसी भी होली थी!*
काँकेर । छत्तीसगढ़ की एक महत्वपूर्ण पुरानी रियासत कांकेर में सोमवंशी चंद्रवंशी शासकों का राज्य 1000 वर्षों से कम पुराना नहीं है और इसी आधार पर यह मानना होगा कि जब से यहां राजाशाही थी , तब से होली तथा अन्य सभी त्योहार भले ही छोटे पैमाने पर मनाये जाते थे किंतु उत्साह पूर्वक मनाये जाते थे । काँकेर शहर और क्षेत्र के पुराने लोगों को आज भी रियासत कालीन तथा आज से 65-70 वर्ष पूर्व की होली भुलाए नहीं भूलती ,जब आज की होली की तरह ना कोई हुड़दंग होता था, ना केमिकल वाले रंग ,ना मिलावटी मिठाई ! उस ज़माने की होली आदर्श होली थी। आपसी झगड़ा और दुश्मनी को बढ़ाने वाली नहीं बल्कि सबको एक ही रंग में रंगने वाली, दोस्ती बढ़ाने वाली होली थी । आज उस होली की सिर्फ़ यादें ही बाक़ी रह गई हैं ।
काँकेर रियासत में 1000 वर्ष पूर्व से होली का त्यौहार निरंतर चला आ रहा है। जब काँकेर के कण्डरा राजा गढ़िया पहाड़ पर क़िला बनाकर रहते थे और उनकी अधिकतर प्रजा भी वहीं रहती थी । उस पहाड़ी राजा के समय जिस स्थल पर पहली होली जलती थी ,आज भी ठीक उसी स्थल पर पहली होली प्रज्वलित की जाती है और वहीं से होली की पवित्र अग्नि पहाड़ के नीचे लाकर, राजापारा ,राजमहल तथा काँकेर के विभिन्न मोहल्लों में होलिका दहन किया जाता है, 10 शताब्दियों की लंबी अवधि बीत गई ,परंतु वही रस्म आज तक चली आ रही है। कालांतर में राजा नरहर देव, कोमल देव तथा भानु प्रताप देव का शासन काँकेर ने 19वीं तथा बीसवीं शताब्दी में देखा । यह ज़माना आते-आते पीतल की पिचकारियाँ तथा कारखानों में बने कृत्रिम रंग आ गए । उसके बाद पीतल की पिचकारी का दिखना भी दुर्लभ हो गया। प्लास्टिक की घटिया पिचकारियों तथा घटिया केमिकल वाले रंगों से होली का बाज़ार पटने लगा। फिर भी सन् 1960 तक महाराजा भानुप्रताप देव ने काँकेर की होली का स्तर गिरने नहीं दिया। उनके ज़माने तक टेसू अर्थात पलाश के रंग होली में मुख्य भूमिका में थे और मिठाइयां भी असली देसी स्वाद वाली होती थीं ,जिनका वितरण सब लोगों द्वारा अपने-अपने पड़ोसियों तथा मित्र मंडली और नौकरों चाकरो तक में बिना भेदभाव के किया जाता था। महाराजा भानुप्रताप देव की होली, दिनभर महलों और मंदिरों में चलने के बाद शाम को राजापारा में अपने परम मित्र, सेठ हबीब भाई के यहां समाप्त होती थी। उम्र में हबीब सेठ महाराजा साहब से बड़े थे। अतः उनकी भूमिका बड़े भाई की भी होती थी और उससे भी बढ़कर परम मित्र की । दोनों ऐसे पक्के मित्र थे कि सिनेमा हॉल में भी उनकी विशेष आराम कुर्सियां आजू-बाजू ही लगाई जाती थीं और उनमें महाराजा साहब और हबीब भाई के नाम पेंट किए गए होते थे । सिनेमा के अलावा दोनों मित्रों की मुलाक़ात होली के दिन ही होती थी । दोनों साथ साथ ही होली के रंगों की बौछार और चौरसिया परिवार के यहां बनी शुद्ध मिठाइयों का मज़ा लेते थे । जब दोनों मित्र जी भर कर होली खेल लेते थे और महाराजा की कार हबीब सेठ के आलीशान भवन से महल के लिए चल पड़ती थी ,तभी उस वर्ष के होली के त्यौहार का समापन माना जाता था ,और लोग नदी- तालाबों में स्नान के लिए चल पड़ते थे। हबीब भाई और महाराजाधिराज की होली सन् 1940 से 1960 तक चली। सन् 1960 में हबीब सेठ गुज़र गए और उस ज़माने की शानदार दर्शनीय होली भी प्रतिवर्ष फीकी पड़ती गई ।अब तो त्योहार के नाम पर रस्म अदायगी ही रह गई है और काँकेर की उस ज़माने की होली की यादें ही बाक़ी रह गई हैं।
(“बस्तर बन्धु ” की पुरानी फाइल से )
