बस्तर बंधु 1995 से ही बस्तर को रेल मार्ग से मुख्य रेलमार्गों तक जोड़ने की मांग करता आया है,,,,,,,,,,भाजपा की डबल इंजन की सरकार क्या कांकेर में रेल लाईन लाने में अपनी रुचि दिखाएगी…..???

बस्तर बंधु 1995 से ही बस्तर को रेल मार्ग से मुख्य रेलमार्गों तक जोड़ने की मांग करता आया है,,,,
भाजपा की डबल इंजन की सरकार क्या कांकेर में रेल लाईन लाने में अपनी रुचि दिखाएगी…..???


◾अनूप शर्मा◾
कांकेर (बस्तर बन्धु ) आज 19 दिसंबर के नवभारत के जगदलपुर संस्करण में यह मांग उठाई गई है कि दक्षिण बस्तर के बैलाडीला किरंदुल को यदि 125 किलोमीटर दूर तेलंगाना के मनगुर स्टेशन से रेल द्वारा जोड़ दिया जाता है, तो न केवल बस्तर बल्कि पूरा छत्तीसगढ़ दक्षिण भारत से जुड़ जाएगा,,,,,समाचार में यह भी बताया गया है कि 6 वर्ष पूर्व इस लाइन का सर्वे हुआ था और बजट में धनराशि भी स्वीकृत हुई थी, मगर ज़रा सा भी काम नहीं हुआ है और अब रेल मंत्रालय कह रहा है कि जब तक किरंदुल से विशाखापट्टनम लाइन का दोहरीकरण नहीं हो जाता, तब तक बस्तर में कोई नई रेल लाइन नहीं बनाई जाएगी और ना कोई एक्सप्रेस चलेगी। यहां भी यह कहावत लागू होती है कि “न नौ मन तेल होगा, ना राधा नाचेगी”
समाचार छोटा किंतु महत्वपूर्ण है और इससे साबित होता है कि हमारी सरकारें विशेषकर केंद्र सरकार बस्तर के विकास को लेकर कभी भी गंभीर नहीं रही और बहानेबाजी में ही समय बिताती रही है । बस्तर बंधु के सुधी पाठक जानते हैं कि हमारे इस छोटे से अख़बार में सन् 1995 से ही लगातार बस्तर में विकास के लिए क्या-क्या किया जा सकता है इस पर सुझाव छपते ही रहे हैं तथा रेलवे का मामला उनमें सर्वोपरि रखा जाता रहा है। स्वर्गीय सुशील शर्मा संस्थापक बस्तर बंधु ने बहुत पहले ही बस्तर में रेल लाइन संबंधी सर्वे किया था। इसके निष्कर्ष प्रकाशित हुए थे, तब लोगों को पहली बार पता चला था कि 1944 से पहले उत्तर बस्तर के छोर पर स्थित लिकमा गांव में स्टेशन था जो वर्तमान बोरई तथा घुटकेल से बिल्कुल नज़दीक है। लिकमा से छोटी लाइन दुगली, सिंहपुर, कुरूद होते हुए रायपुर तक जाती थी जिसे रायपुर फॉरेस्ट ट्रेन कहा जाता था। इस लेख के प्रकाशन के बाद देश के अनेक पत्रकारों ने स्वयं जाकर देखा कि इन स्थानों में पुराने स्टेशनों के अवशेष विशाल कुंए ,स्टाॅफ क्वार्टर्स, रेलवे का कबाड़ आदि बहुत कुछ सबूत आज भी पड़े हैं तथा यह बताने वाले लोग भी मौजूद हैं कि इस स्थान पर 1944 से पूर्व रेल चलती थी, जहां अब बस भी नहीं जाती। इस मामले को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट नेता स्वर्गीय अमल कुमार बंदोपाध्याय ,विजयपाल सिंह तथा फरसगांव निवासी सरदार मोहनसिंह ने बार-बार पत्र व्यवहार करते हुए उठाया लेकिन आज तक केंद्र की जो भी सरकारें हुई हैं, किसी ने ध्यान नहीं दिया सिर्फ़ एक बार बंदोपाध्याय जी को जवाब आया था कि “डू यू मीन बालोद धमतरी लाइन? दैट इज़ नॉट प्रपोज्ड,, ।”
यह इस प्रकार का जवाब था जैसे कहावत है “पूछो खेत की तो बताएं खलिहान की” इसके पश्चात प्रयास किए गए कि बस्तर के सांसद इस मामले को संसद में उठाएं लेकिन तब से अब तक इतने सांसद हो गए, किसी ने यह मामला लोकसभा में नहीं उठाया और एक ही रट लगाते रहे कि हमें पार्टी के अनुशासन में रहना पड़ता है। यदि यह मामला सही तरीक़े से लोकसभा में उठाया जाता और इस पर कार्य होता तो लिकमा, बोरई से कांकेर तक भी रेल लाना आसान हो जाता। लिकमा से बोरई ,माकड़ी, कोंडागांव होते हुए जगदलपुर को भी जोड़ा जा सकता था, जिससे जगदलपुर से रायपुर सीधा रेल मार्ग हो जाता वर्तमान में ऐसी सीधी रेल लाइन मांगने वालों को एक लॉलीपॉप थमा दिया गया है, जिसके अनुसार किरंदुल वाली लाइन को उड़ीसा में ही रायगढ़ा होते हुए पहले से बना हुआ छत्तीसगढ़ का घुमावदार रास्ता बता दिया गया है। इस तरह रेल विभाग ने जगदलपुर को रायपुर दुर्ग तक बिना 1/- खर्च किए रेल चल रही बता दी है। इस ट्रेन से जगदलपुर से रायपुर जाने में 16 घंटे लगते हैं, जबकि बस 6 घंटे में पहुंचा देती है और यदि बस्तर बंधु के सुझाव के अनुसार कोंडागांव बोरई होते हुए सीधे रायपुर रेल लाइन होती तो 5 घंटे में जगदलपुर के लोग रायपुर पहुंच सकते थे । इस उदाहरण से स्पष्ट है कि सरकारों द्वारा बस्तर के लोगों को किस तरह बेवकूफ़ बनाया जा रहा है। यदि रेल मंत्रालय ईमानदारी से काम करे तो किरंदुल से मनगुर तेलंगाना की बात ही क्या है, किरंदुल को खम्मम, हैदराबाद तथा खम्मम से ही दिल्ली की लाइन से मिलाया जा सकता है ,यही नहीं पखांजूर को चंद्रपुर बल्लारशाह से जोड़कर दिल्ली लाइन से मिलाया जा सकता है । खम्मम तेलंगाना से विजयवाड़ा (आंध्र) तथा चेन्नई (तमिलनाडु) के लिए भी मेन रूट मिल सकता है ,जिससे न केवल बस्तर का बल्कि सारे छत्तीसगढ़ का भला हो सकता है, दक्षिण भारत का रास्ता खुल सकता है लेकिन हमारी सरकार करना चाहे तब तो? उसके पास तो जनता को बेवकूफ़ बनाने के सैकड़ों तरीक़े हैं लेकिन भलाई करने के नाम पर केवल बहाने बाजी,,,,अब देखना यह है कि भाजपा की डबल इंजन का दंभ भरने वाली भाजपा सरकार क्या कांकेर में रेल लाईन लाने में अपनी रुचि दिखाएगी…..या पूर्व की भांति आदिवासी अंचल बस्तर संभाग का प्रवेश द्वार कहलाने वाले कांकेर जिला मुख्यालय को अभी और भी इंतजार करना होगा…. ???
